भारत में संवैधानिक विकास (Part 1)

  • भारत का संवैधानिक इतिहास ईस्ट इंडिया कंपनी की स्थापना के साथ प्रारंभ होता है, जिसे सन 1600 ई. का राजलेख कहा गया। इसके माध्यम से महारानी एलिजाबेथ प्रथम ने ईस्ट इंडिया – कंपनी की स्थापना कर उसे पूर्वी देशों में 15 वर्षों तक व्यापार करने का अधिकार प्रदान किया।
  • 1757 ई. का प्लासी युद्ध तथा 1764 ई. का बक्सर का युद्ध अग्रेजों की महत्वाकांक्षाओं को बढ़ा दिया इसलिये शासन को अपने अनुकूल बनाये रखने के लिए अनेक अधिनियम/चार्टर की आवश्यकता महसूस की गई।
  • 1765 ई. में इलाहाबाद की संधि मील का पत्थर साबित हुई। गवर्नर के अतिरिक्त 24 अन्य सदस्य शामिल थे, जिन्हें ‘गवर्नर’ और उसको परिषद’ की संज्ञा दी गई। ईस्ट इंडिया कंपनी ने अपना कार्य सूरत से प्रारंभ किया।
  • 26 नवम्बर 1949 को भारतीय संविधान सभा द्वारा निर्मित ‘भारत का संविधान’ के पूर्व ब्रिटिश संसद द्वारा कई ऐसे अधिनियम/चार्टर पारित किये गये थे, जिन्हे भारतीय संविधान का आधार कहा गया है।

1. 1726 का राजलेख – कलकत्ता, बम्बई और मद्रास प्रेसीडेंसियों मद्रास के गवर्नर एवं उनकी परिषद को ” विधि बनाने की शक्ति” प्रदान की गयी थी।

    – पहले यह इंग्लैण्ड के निदेशक बोर्ड में निहित थी ।

2. 1773 का रेग्युलेटिंग ऐक्ट – तत्कालीन ब्रिटिश प्रधानमंत्री लार्ड नार्थ (गुप्त समिति) द्वारा 1772 में गठित संसदीय समिति के प्रतिवेदन पर यह ऐक्ट पारित किया गया था। यह प्रथम प्रयास था जिसके माध्यम से भारत में केन्द्रीय प्रशासन की नींव रखी गयी।

  • मद्रास तथा बम्बई प्रेसीडेन्सी को बंगाल प्रेसीडेन्सी के अधीन कर दिया गया।
  • पहली बार लिखित संविधान प्रस्तुत हुआ।
  • बंगाल के गर्वनर को तीनों प्रेसीडेन्सियों का गर्वनर जनरल बना दिया गया। शासन की समस्त सिविल तथा सैनिक शक्ति गवर्नर जनरल तथा उसके चार सदस्यीय परिषद को सौंपा गया।
  • प्रथम गवर्नर जनरल वारेन हेस्टिंग को बनाया गया। इसी एक्ट के द्वारा कंपनी में गवर्नर जनरल का पद सृजित किया गया।
  • व्यापार के लिए लाइसेंस जरुरी कर दिया गया।
  • कलकत्ता में उच्चतम न्यायालय का प्रावधान किया गया। यह अभिलेख न्यायालय था। इसका अधिकार क्षेत्र कलकत्ता नगर के नागरिकों तक सीमित था।
  • सुप्रीम कोर्ट को सिविल, आपराधिक, नौसेना, तथा धार्मिक मामलों में अधिकारिता प्राप्त थी।
  • 1774 में भारत उच्चतम न्यायालय की स्थापना कलकत्ता में की गयीं। इसमें मुख्य न्यायधीश के अलावा तीन अन्य न्यायाधीश थे।
  • सर एलिजाह इम्पे इस न्यायालय के प्रथम मुख्य न्यायाधीश थे। तीन अन्य चैम्बर्स, सेमेस्टर एवं हाइड थे।

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ऐक्ट ऑफ सेटलमेंट 1781 – यह रेग्युलेटिंग एक्ट की त्रुटियों को दूर करने के लिए पारित किया गया था।

    कलकत्ता सरकार बंगाल, बिहार और उड़ीसा के दीवानी प्रदेशों के लिए विधि बना सकती थी। यह एक्ट ऑफ सेटलमेंट के अधीन था।

पिट्स इण्डिया एक्ट 1784 – ऐक्ट ऑफ सेटलमेंट एक्ट का विस्तृत रूप ही पिट्स इण्डिया एक्ट था। यह अधिनियम कम्पनी द्वारा अधिग्रहित भारतीय राज्य क्षेत्रों पर ब्रिटिश ताज के स्वामित्व के दावे का पहला वैधानिक दस्तावेज था।

    युद्ध एवं संधि करने से पूर्व कम्पनी के डायरेक्टरों से स्वीकृति लेना अनिवार्य कर दिया गया।

  • गवर्नर जनरल तथा उनके सदस्यों की संख्या तीन कर दो गई।
  • कर्मचारियों को उपहार लेने पर प्रतिबन्ध लगा दिया गया। भारत में नियुक्त अंग्रेज अधिकारियों के ऊपर मुकदमा चलाने के लिए इंग्लैण्ड में एक कोर्ट की स्थापना की गई।
  • गवर्नर जनरल को प्रान्तीय सरकार बखांस्त करने का अधिकार।

1786 का राजलेख

  • इस अधिनियम के द्वारा गवर्नर जनरल को विशेष परिस्थितियों में अपने परिषद के निर्णय को निरस्त कर अपने निर्णय को लागू करने का अधिकार प्रदान किया और गवर्नर जनरल को सेनापति की शक्तियां प्रदान की गयी।

1793 का राजलेख –

  • इस एक्ट को ईस्ट इण्डिया कम्पनी एक्ट 1793 भी कहा जाता है।
  • कम्पनी के व्यापारिक अधिकारों को अगले 20 वर्षों के लिए बढ़ा दिया गया।
  • ब्रिटिश भारतीय क्षेत्रों में लिखित विधियों द्वारा प्रशासन की नींव रखी गयी।
  • मुख्य सेनापति का गवर्नर जनरल परिषद का स्वत: सदस्य होने का अधिकार समाप्त कर दिया गया।
  • सभी कानूनों एवं विनियमों की व्याख्या का अधिकार न्यायालयों को दिया गया।
  • बोर्ड ऑफ कंट्रोल (नियंत्रण मंडल) के अधिकारियों का वेतन भारतीय कोष से मिलने लगा। इसमें कर्मचारियों तथा सदस्यों का भी वेतन शामिल था।

1813 का राजलेख-

  • कम्पनी के भारतीय व्यापारिक एकाधिकार को समाप्त कर दिया गया। केवल चाय और चीन के साथ व्यापार के एकाधिकार को बनाय रखा गया है।
  • कम्पनी के व्यापारिक अधिकारों को (राजस्व नियंत्रण) 20 वर्ष के लिए बढ़ा दिया गया।
  • ईसाई मिशनरियों को भारत में धर्म प्रचार की अनुज्ञा प्रदान की गयी।
  • भारतीयों को शिक्षा पर । लाख रूपये की वार्षिक धनराशि व्यय का प्रावधान किया गया।
  • स्थानीय स्वायत्तशासी संस्थाओं को करारोपण का अधिकार दिया गया है।

नोट- भारत में स्थानीय स्वशासन की शुरुआत चोल काल में हुई।

1833 का चार्टर अधिनियम (सेंट हेलेना अधिनियम)-

  • बंगाल के गर्वनर जनरल को संपूर्ण भारत का गर्वनर जनरल बना दिया गया।
  • व्यापारिक दर्जा समाप्त अब केवल प्रशासनिक निकाय मात्र रह गई।
  • भारत के प्रशासन का केन्द्रीकरण कर दिया गया।
  • लार्ड विलियम बैंटिक भारत के प्रथम गर्वनर जनरल थे।
  • संपूर्ण देश के लिए एक बजट की व्यवस्था की गयी।
  • भारत में दास प्रथा को गैर कानूनी घोषित किया गया जिसके आधार पर 1843 में दास प्रथा का उन्मूलन कर दिया गया।
  • भारत में सभी प्रचलित रूढ़ियों तथा प्रथाओं को संहिता बद्ध करने के लिए एक विधि आयोग का गठन किया गया। इस आयोग के प्रथम अध्यक्ष लार्ड मैकाले थे।
  • चाय और चीन के साथ व्यापारिक एकाधिकार समाप्त कर दिया गया।
  • गवर्नर जनरल तथा उसके सदस्यों की संख्या जो पिट्स इण्डिया एक्ट द्वारा घटाकर तीन कर दी गई थी उसे चार कर दिया गया।

1853 का चार्टर अधिनियम-

  • 1852 ई. के सेलेक्ट कमेटी को आधार बनाकर
  • कम्पनी के कर्मचारियों की नियुक्ति के लिए प्रतियोगी परीक्षा की व्यवस्था की गयी।
  • नियंत्रक बोर्ड की संख्या 24 से घटाकर 18 कर दी गई। जिसमें 6 सदस्य नामित होंगे।
  • गवर्नर जनरल को सहायता के लिए 6 विधान परिषद के सदस्यों, 4 गवर्नर जनरल की परिषद के सदस्यों तथा एक सेनापति द्वारा की जाती थी।
राज्यों में विधान परिषद् गठित
राज्यवर्ष
बंगाल1862
उत्तर पश्चिम प्रांत1866
पंजाब1897
  • 1854 में भारतीय सिविल सेवा के संबंध मे मैकाले समिति नियुक्ति की गई।
  • इस अधिनियम द्वारा गर्वनर जनरल की परिषद के विद्यापिका और प्रशासनिक कार्यों को अलग कर दिया गया।
  • जिसके तहत भारत में पृथक भारतीय विधान परिषद् का गठन हुआ। जिसका मुख्य कार्य देश के लिए विधि बनाना था।
  • भारतीय केन्द्रीय विधान-परिषद में (स्थानीय) क्षेत्रीय प्रतिनिधित्व का समावेश किया गया।
  • 1853 के अधिनियम ने सर्वप्रथम सम्पूर्ण भारत के लिए एक विधान-मण्डल की स्थापना की (All India Legislative council)

भारत सरकार अधिनियम, 1858 – ब्रिटिश संसद की निम्न सदन हाउस ऑफ कामन्स द्वारा भारत में उत्तरदायी शासन की स्थापना के लिए विधेयक तैयार किया गया जो अधिनियम बनकर प्रवृत्त हुआ।

  • एक्ट फार द बेटर गवर्नमेंट ऑफ इण्डिया नाम से पारित किया गया।
  • भारत में कम्पनी का शासन समाप्त कर दिया गया तथा भारत का शासन इग्लैंड की साम्राज्ञी के नाम से किया जाने लगा।
  • ब्रिटिश साम्राज्ञी की ओर से भारत राज्य सचिव का पद गठित किया गया।
  • भारत राज्य सचिव को सहायता के लिए 15 सदस्यों की भारत परिषद का गठन किया गया।
  • भारत राज्य सचिव को बैठकों में अतिरिक्त निर्णायक मत देने का अधिकार प्राप्त था।
  • भारत के गर्वनर जनरल पद को बदलकर वायसराय कर दिया गया।
  • बोर्ड ऑफ डायरेक्टर्स तथा बोर्ड ऑफ कन्ट्रोल को समाप्त कर दिया गया।
  • भारत राज्य सचिव को ब्रिटिश संसद के समक्ष भारत के बजट को प्रतिवर्ष रखने का अधिकार दिया गया।
  • वायसराय लार्ड केनिंग ने सर्वप्रथम ‘विभाग प्रणाली’ की शुरूआत की।
  • देश के शासन में विकेन्द्रीकरण की शुरूआत हुईं।

1861 के भारतीय परिषद अधिनियम की विशेषता:-

  • 1861 में लॉर्ड कैनिंग ने तीन भारतीयों बनारस के राजा, पटियाला के महाराजा और सर दिनकर राव क्रो विधान परिषद् में मनोनीत किया।
  • मद्रास और बम्बई प्रेसिडेंसी को विधायी शक्तियाँ देकर विकेन्द्रीकरण की प्रकिया शुरू की।
  • केन्द्रीय कार्यकारिणी सदस्यों की संख्या 5 कर दी गई।
  • लार्ड कैनिंग द्वारा प्रारंभ की गई मंत्रालय प्रणाली को मान्यता दी गयी।
  • भारत में मंत्रिमंडलीय व्यवस्था की नीव पड़ी। वायसराय को आपात काल में अध्यादेश जारी करने का अधिकार प्राप्त हुआ।
  • वायसराय को विधान सभा में भारतीयों को मनोनीत करने की शक्ति प्रदान की गयी।
  • 1873 का अधिनियम – 1 जनवरी, 1884 को ईस्ट इण्डिया कम्पनी को औपचारिक रूप से भंग कर दिया गया।
  • 1876 का शाही उपाधि अधिनियम- केंद्रीय कार्यकारिणी में छठे सदस्य की नियुक्ति कर उसे लोक निर्माण विभाग का कार्य सौंपा गया तथा विक्टोरिया को भारत का साम्राज्ञी घोषित किया गया।

1892 का अधिनियम-

  • इस अधिनियम ने भारत में प्रतिनिधि सरकार की नींव डाली।
  • केन्द्रीय और प्रान्तीय विधान परिषद् के दो तिहाई सदस्यों को एक सीमित और परोक्ष रूप से चुनाव का प्रावधान किया गया जिसे निकायों की सिफारिश पर की जाने वाली नामांकन की प्रक्रिया कहा गया। (विश्वविद्यालय, जिला बोर्ड, नगरपालिका)
  • केन्द्रीय विधान परिषद ने न्यूनतम 10 तथा अधिकतम 16 नियत की गई।
  • विधान परिषदों के सदस्यों को सार्वजनिक हित के विषयों पर प्रश्न पूछने तथा बजट एवं वार्षिक वक्तव्य पर बहस करने का अधिकार दिया गया किन्तु मतदान का अधिकार नहीं दिया गया।
  • कुछ हद तक भारत में संसदीय व्यवस्था का प्रचलन प्रारम्भ हो गया।
  • केन्द्रीय विधान परिषद सदस्यों की संख्या बढ़ाई।

1909 के अधिनियम (मार्ले-मिंटो सुधार)-

  • मार्ले भारत राज्य सचिव और मिंटो भारत का वायसराय था।
  • अरूण्डले समिति के रिपोर्ट के आधार पर।
  • केन्द्रीय और प्रान्तीय विधान परिषद में अतिरिक्त सदस्यों की संख्या में वृद्धि की गयी।
  • विधान परिषद के कार्यों में वृद्धि की गयी और किसी भी विषय पर प्रश्न एवं पूरक प्रश्न पूछने का अधिकार तथा सामान्य और लोक हित सार्वजनिक मामलों पर बहस के लिए नियम बनाने का अधिकार दिया गया।
  • केन्द्रीय विधान परिषद में सदस्यों की संख्या बढ़ाकर 60 कर दी गई जो पहले अधिकतम 16 थी। अब 69 सदस्य हो गये। 37 शासकीय, 32 अशासकीय।
  • सत्येंद्र प्रसाद सिन्हा को वायसराय की कार्यपालिका परिषद का प्रथम भारतीय सदस्य बनाया गया।
  • पृथक निर्वाचन के आधार पर मुस्लिमों के लिए सांप्रदायिक प्रतिनिधित्व का प्रावधान किया गया। स्त्रियों को मताधिकार नहीं प्राप्त था।
  • लार्ड मिन्टों को सांप्रदायिक निर्वाचन का जनक कहा गया।
  • राजनीतिक दल के रूप में मुस्लिम लीग की स्थापना (1906 में) हुई। भारतीय विकेन्द्रीकरण आयोग की स्थापना की गयी।
  • फूट डालो राज करो नीति का प्रार्दुभाव हुआ।

भारत शासन अधिनियम-1919 (मांटेग्यू चेम्सफोर्ड सुधार)-

    इसे मांटेग्यू चेम्सफोर्ड सुधार कहा गया जिनमें मांटेग्यू भारत के राज्य सचिव और चेम्सफोर्ड भारत के वायसराय थे।

  • इस अधिनियम ने प्रान्तों में एक उत्तरदायी सरकार की स्थापना की।
  • मताधिकार की अर्हता सम्पति के आधार पर निर्धारित थी। स्त्रियों को मताधिकार दिया गया किन्तु परिषदों की सदस्य नहीं बन सकती थी।
  • प्रान्तों में द्वैध शासन व्यवस्था और प्रत्यक्ष निर्वाचन की व्यवस्था की गयी।
  • अर्थात (राज्य सभा) उच्च सदन और निम्न सदन (लोक सभा) थे।
  • केन्द्र और प्रान्तीय विषयों की सूची को पृथक कर दिया गया तथा प्रान्तीय विषय को दो भागों में बॉट दिया गया-

    (1) हस्तांतरित विषय,                      (2) आरक्षित विषय

  • आरक्षित विषयों की श्रेणी में जेल, पुलिस, न्याय. वित्त सिचाई तथा हस्तान्तरित विषयों में कम महत्व के विषय शिक्षा, खेती, स्थानीय स्वायत्त शासन आते थे।
  • प्रान्तीय विधान परिषदों का कार्यकाल 3 वर्ष था तथा अपने क्षेत्राधिकार के अन्तर्गत कानून बनाने व बजट पारित करने का अधिकार था।
  • अधिनियम के पारित होने के दस वर्ष बाद संवैधानिक सुधारों की जाँच के लिए ब्रिटिश संसद द्वारा एक आयोग का गठन किया जाएगा।

1926 में लोक सेवा आयोग का गठन किया गया

साइमन कमीशन-1927- नवंबर 1927 में गठित वैधानिक आयोग ने अपनी रिपोर्ट 1930 में पेश की जिसमे दोहरी शासन प्रणाली, राज्यों का विस्तार की अनुशंसाएं की गई।

  • सभी दलों द्वारा साइमन कमीशन का विरोध किया गया क्योंकि आयोग में कोई भी सदस्य भारतीय नहीं था।

नोट- इसके विरोध में नेहरु समिति गठित हुई। माती लाल नंहरु समिति के विरोध में जिन्ना की 11 सूत्रीय मांगें थी।

सांप्रदायिक अवार्ड, पूना पैक्ट:- अगस्त 1932 में रैम्जै मैक्डोनाल्ड ने अल्पसंख्यकों के प्रतिनिधित्व पर एक योजना प्रस्तुत की जिसका गाँधी जी द्वारा विरोध हुआ और कांग्रेस नेताओं और दलित नेता भीमराव अम्बेडकर के बीच एक समझौता हुआ था जिसे पूना पैक्ट कहा गया।

भारत सरकार अधिनियम 1935-

  • वर्तमान संविधान पर इस नियम का सर्वाधिक प्रभाव पड़ा है।
  • 1935 का अधिनियम ब्रिटिश संसद के इतिहास में यह सबसे बड़ा और जटिल अधिनियम माना जाता है।
  • इस अधिनियम में 14 भाग 321 धाराएँ और 10 अनुसूचियाँ थी।
  • साइमन आयोग 1927 के बाद कुछ ऐसी घटनायें घटी जो 1935 के अधिनियम का आधार बनी।

(1) मोती लाल नेहरू की अध्यक्षता में गठित कमेटी 10 अगस्त 1928

(2) जिन्ना द्वारा 14 सूत्रीय कार्यक्रम को पेश करना-29 मार्च 1929

(3) गोलमेज सम्मेलन – प्रथम 1930, द्वितीय 1931, तृतीय सम्मेलन 1932. द्वारा श्वेत पत्र का प्रस्तुतीकरण।

महत्वपूर्ण विशेषता-

  • भारत का संघ स्थापित करने का सुझाव दिया गया।
  • किन्तु अवशिष्ट शक्तियों को गर्वनर जनरल को सौंपी गयी थी।
  • केन्द्र में द्वैध शासन की स्थापना की गयी। आशिक उत्तरदायी सरकार की स्थापना का प्रावधान किया गया। केन्द्रीय सरकार के विषयों को बाँट दिया गया।
  • 1935 भारतीय अधिनियम के अनुसार केन्द्रीय विधानमण्डल के तीन अंग थे-
  • राज्य परिषद एक स्थायी संस्था थी, जिसमें ब्रिटिश भारतीय सदस्यों को प्रादेशिक निर्वाचन क्षेत्रों के माध्यम से प्रत्यक्ष निर्वाचन रीति से तथा विधान सभा के सदस्य निम्न सदनों के सदस्यों से निर्मित निर्वाचक मण्डलों के माध्यम से परोक्ष निर्वाचन द्वारा चुने जाते थे।
  • इस अधिनियम द्वारा बर्मा को भारत से अलग कर दिया गया।
  • धन विधेयक केवल विधान सभा में ही पेश किया जा सकता था।
  • अधिनिमय द्वारा संघ की राजधानी दिल्ली में एक संघीय न्यायालय की स्थापना का उपबन्ध किया था। जिनको संविधान की व्याख्या का प्राथमिक तथा पुनर्विचार का अधिकार प्रदान किया गया परंतु अंतिम निर्णय प्रिवी कांउसिल को प्राप्त था। 1937 में संघीय अदालत की स्थापना हुई।
  • 1935 के अधिनियम में प्रान्तों से द्वैध शासन प्रणाली का अन्त कर स्वशासन (Autonomy) स्थापित की गई।
  • 1935 के अधिनियम के द्वारा 6 प्रान्तों-मद्रास, बम्बई, बंगाल, बिहार संयुक्त प्रान्त तथा असम में द्विसदनीय विधान मंडल की स्थापना की गई थी।
  • निम्न सदन (Legislative Assembly) अथवा विधान सभा तथा उच्च सदन (Legislative council) अथवा विधान परिषद कहलाया। शेष प्रान्तों में एक सदन (11 प्रान्त) विधान सभा का गठन किया गया।
  • विधान सभा के लिए चुनाव प्रत्यक्ष चुनाव पद्धति से होने की व्यवस्था थी किन्तु मताधिकार के लिए कई मानक बनाये गये। अधि कतम महत्व सम्पत्ति को दिया गया।
  • विधान सभा का कार्यकाल 5 वर्ष और विधान परिषद स्थायी सदन जिसके सदस्य 9 वर्षों के लिए चुने जाते थे किन्तु विधान परिषद के 1/3 सदस्य हर तीसरे वर्ष अवकाश ग्रहण करते थे।
  • प्रांतीय शासन के अध्यक्ष के रूप में राज्यपाल की नियुक्ति की गयी थीं।
  • शिक्षा के क्षेत्र में महात्मा गाँधी की बुनियादी शिक्षा योजना को लागू करके प्रारम्भिक शिक्षा को सुलझाने का प्रयास किया गया।
  • भारतीय रिजर्व बैंक की स्थापना की गई।
  • संघीय लोक सेवा स्थापित होने के अलावा प्रान्तों में राज्य लोक संवा आयोग तथा दो राज्यों के लिए संयुक्त सेवा आयोग की स्थापना हुई।
  • 1937 में प्रान्तीय विधान सभाओं के चुनाव संपन्न हुए जिसमें कांग्रेस सबसे बड़ी पार्टी के रूप में उभरी।

भारत शासन अधिनियम के अधीन 1937 में विधानसभा चुनाव 11 प्रांतों में चुनाव

    1. मद्रास, मुम्बई, बिहार, उड़ीसा, मध्य प्रांत, संयुक्त प्रांत में कांग्रेस की सरकार पूर्ण बहुमत के साथ स्थापित हुई।

    2 पश्मित्तर प्रान्त, असम तथा सिंध मिली-जुली सरकार।

    3. पंजाब में यूनियनिस्ट पार्टी तथा बंगाल में कृषक प्रजा पार्टी की सरकार गठित हुई।

कैबिनेट मिशन-1946: द्वितीय विश्व युद्ध समाप्त होने के बाद ब्रिटेन में लेबर पार्टी सत्ता में आयी और भारतीय समस्याओं के लिए मार्च 1946 में कैबिनेट मिशन भारत भेजा गया। इसमें तीन सदस्य लार्ड पैथिक लारेन्स, स्टेफर्ड क्रिप्स और ए.वी. एलेक्जेंडर शे। कैबिनेट मिशन का मुख्य कार्य संविधान सभा का गठन कर भारतीयों के लिए भारतीयों द्वारा संविधान बनाने का कार्य आरम्भ करना था।

अन्तरिम सरकार का गठन-1946: 24 अगस्त 1946 को कैबिनेट मिशन के कुछ सुझावों के आधार पर प्रथम अन्तरिम सरकार का गठन किया गया। 26 अक्टूबर 1946 को सरकार का पुनर्गठन किया गया। जिसमें मुस्लिम लीग के 5 सदस्यों को इसमें शामिल कर लिया गया और सरकार में मुस्लिम लीग की हिस्सेदारी बनी।

क्रममंत्रीविभाग
1.पं. जवाहर लाल नेहरूकार्यकारी परिषद के उपाध्यक्ष, विदेशी मामले तथा राष्ट्रमण्डल
2.सरदार बल्लभ भाई पटेलगृह, सूचना तथा प्रसारण
3.डा. राजेन्द्र प्रसादखाद्य एवं कृषि
4.सी. राजगोपालाचारीशिक्षा
5.आसफ अलीरेलवे
6.जगजीवन रामश्रम
7.डॉ. जॉन मथाईउद्योग तथा आपूर्ति
8.सी. एच. भाभाबन्दरगाह तथा खान
9.लियाकत अली खाँवित्त (मुस्लिम लीग)
10.गजनफर अली खाँस्वास्थ्य (मुस्लिम लीग)
11.जोगेंद्र नाथ मंडलविधि (मुस्लिम लीग)
12.अब्दुर-रब नश्तरसंचार (मुस्लिम लीग)
13.आई-आई चुंदरीगरवाणिज्य (मुस्लिम लीग)
14.सरदार बलदेव सिंहरक्षा

भारतीय स्वतंत्रता अधिनियम-1947: भारतीय साम्प्रदायिक दंगों को देखकर ब्रिटिश प्रधानमंत्री क्लीमेंट एटली ने 1947 में लार्ड माउन्टबेटन को वायसराय नियुक्त कर सत्ता के हस्तांतरण के लिए भारत भेजा।

  • 3 जून 1947 को माउंटबेटन की विभाजन योजना काग्रेस और मुस्लिम लीग ने स्वीकार कर ली। इस योजना को माउंटबेटन योजना कहा गया।
  • माउंटबेटन योजना को कानूनी रूप प्रदान करने के लिए 18 जुलाई 1947 को भारतीय स्वतंत्रता अधिनियम पेश किया गया।
  • अधिनियम में दो डोमिनियनों की स्थापना के लिए 15 अगस्त 1947 की तारीख निर्धारित की गयी।
  • वायसराय का पद समाप्त कर दोनों राष्ट्रों में गवर्नर जनरल का पद घोषित किया।
  • भारतीय संविधान सभा को अपने देश का संविधान बनाने और दूसरे देश के संविधान को अपनाने को स्वतंत्रता थी।
  • 15 अगस्त 1947 से 26 जनवरी 1950 को भारतीय संविधान के लागू होने तक भारत का राजनीतिक दर्जा ब्रिटिश राष्ट्रकुल का एक औपनिवेशक राज्य का था।
अगले नोट्स :-

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