मूल अधिकार (Part 10)

अधिकार क्या?

    मानव जीवन की वे परिस्थितियाँ जिनके अभाव में सामान्यत: व्यक्ति अपने व्यक्तित्व का सर्वोत्तम विकास नहीं कर सकता है।

मानवाधिकार

    ये वे अधिकार हैं जो हमें मानव होने के नाते प्राप्त होते हैं। यह एक व्यापक अवधारणा है जैसे-जैसे हम संकुचित मानसिकता से बाहर निकलते हैं वैसे-वैसे मानवाधिकार का दायरा बढ़ता जाता है। नोट- व्यक्ति के मौलिक अधिकार या नागरिक अधिकार समाप्त भी हो जाये तो भी मानवाधिकार बने रहते हैं। मानवाधिकार की सार्वभौमिक घोषणा 10 दिसंबर 1948 ई. हुई जिसे अन्तर्राष्ट्री मैंग्नाका्ट कहा जाता हैं।

    मूल अधिकार का सर्वप्रथम विकास ब्रिटेन में हुआ। भारतीय संविधान के भाग-3 में अनुच्छेद 12 से 35 तक मूल अधिकार का प्रावधान किया गया है इसे भारत का अधिकार पत्र (Magna carta) कहा जाता है। इंग्लैण्ड के सम्राट जॉन द्वारा 1215 में जारी मैग्नाकार्टा प्रथम लिखित दस्तावेज था। इसी को मूल अधिकारों का जन्मदाता माना जाता है। इंग्लैण्ड में Bill of rights द्वारा जनता को मूल अधिकार प्राप्त हैं।

  • फ्रांस में एक लंबे संघर्ष के पश्चात सन् 1789 में मानव एवं नागरिकों के अधिकार घोषणापत्र द्वारा फ्रांस की जनता को कुछ मूलभूत अधिकार प्रदान किया गया था।
  • अमेरिका के संविधान में मूल अधिकारों का कोई उल्लेख नहीं था किन्तु दसवें संविधान संशोधन द्वारा 1791 में अधिकार पत्र जोड़ा गया। अमेरिका और फ्रांस में प्राकृतिक अधिकारों को मूल अधिकार के रूप में मान्यता दी गयो।
  • किसी भी नागरिक के पूर्ण विकास (भौतिक बौद्धिक, नैतिक एवं आध्यात्मिक विकास) के लिए मूल अधिकार आवश्यक हैं।

भारत में मूल अधिकार की माँग तथा संवैधानिक स्थिति

  • भारत में सर्वप्रथम मूल अधिकार की मांग संविधान विधेयक 1895 ई. के माध्यम से की गई।
  • श्रीमती एनी बेसेण्ट के कॉमन वेल्थ ऑफ इण्डिया बिल 1925 तथा मोती लाल नेहरू रिपोर्ट 1928 में भारतीयों के लिए मूल अधिकार की मांग की गयौं। साइमन कमीशन 1927 तथा संयुक्त संसदीय समिति 1934 में मूल अधिकार की मांग को अस्वीकार कर दिया गया जिससे 1935 के भारत सरकार अधिनियम में मूल अधिकारों को शामिल नहीं किया गया।
  • संविधान के निर्माण के समय संविधान सभा ने सरदार बल्लभभाई पटेल की अध्यक्षता में मूल अधिकार और अल्पसंख्यकों के अधिकारों के लिए एक समिति का गठन किया। कुछ समय पश्चात जे. वी. कृपलानी की अध्यक्षता में एक उपसमिति का गठन किया गया इन्ही समिति और उपसमिति की सिफारिशों ने संविधान में मूल अधिकारों को शामिल किया गया।
  • संविधान में मूल अधिकारों से सम्बन्धित उपबन्धों को समाविष्ट करने का उद्देश्य एक विधि-शासित सरकार की स्थापना करना जिसमें अल्पसंख्यकों का शोषण न हों, अर्थात डायसी के “विधि शासन” (Rule of law) की स्थापना करना।
  • भारत संविधान के मूल रूप में भाग-3 में 7 मूल अधिकारों का उल्लेख किया गया था किन्तु वर्तमान में 6 मूल अधिकार है।

राज्य की परिभाषा- अनुच्छेद 12:

    राज्य में निम्नलिखित शामिल हैं।

    1. भारत सरकार और भारत की संसद

    2. राज्य सरकार और विधान मण्डल

    3. सभी स्थानीय निकाय, नगरपालिकाएं, पंचायत, जिला बोर्ड आदि।

    4. अन्य प्राधिकारी जिसका तात्पर्य है वे प्राधिकारी जो शासकीय या संप्रभु शक्ति (Sovereign power) का प्रयोग करते है।

जैसे- वैधानिक या गैर-संवैधानिक प्राधिकरण एलआईसी, ओएनजीसी, सेल आदि।

  • इसमें शामिल इकाइयों के कार्यों को अदालत में तब चुनौती दी जा सकती है जब वह मूल अधिकारों का हनन कर रहा हो। मूल अधिकारों से असंगत या उनका अल्पीकरण करने वाली विधियाँ (अनुच्छेद 13)
  • अनुच्छेद 13 के उपखण्ड 2 में राज्य ऐसी कोई विधि नहीं बनाएगा जो भाग 3 द्वारा प्रदत्त मूल अधिकार में हस्तक्षेप करती हैं। इस खण्ड के उल्लंघन में बनाई गई प्रत्येक विधि उल्लंघन की मात्रा तक शुन्य होगी।
  • अनुच्छेद 13 मूल अधिकारों का आधार स्तम्भ तथा न्यायालयों को शक्ति देता है कि वह मूल अधिकारों की रक्षा करें।

न्यायिक पुनर्विलोकन- यह शक्ति न्यायालयों को अनुच्छेद 13 द्वारा प्राप्त होती है। जो अनुच्छेद 32 तथा अनुच्छेद 226 के द्वारा क्रमश: उच्चतम न्यायालय तथा उच्च न्यायालयों को प्रदान की गई है।

    नोट- न्यायिक पुनर्विलोकन संसदीय सर्वोच्चता तथा न्यायिक सर्वोच्चता में समन्वय बनाने का कार्य करती है। जहां संसद संविधान में संशोधन तथा विधि बना सकती है वहीं न्यायपालिका इसके असंगत होने पर विधि शून्य घोषित कर सकती है।

  • फ्रांसीसी दार्शनिक मान्टेस्क्यू ने सरकार के सभी अंगों की अनियन्त्रित शक्ति पर अंकुश लगाने के उद्देश्य से शक्ति पृथक्करण के सिद्धान्त (Separation of powers) का प्रतिपादन किया था न्यायिक पुनर्विलोकन की धारणा सीमित शक्ति वाली सरकार के सिद्धान्त से हुआ है जिसमें दो विधियाँ हैं।

    (i) साधारण विधि                         (ii) सर्वोच्च विधि अर्थात संविधान

  • न्यायिक पुनर्विलोकन के सिद्धान्त को सर्वप्रथम अमेरिका के सुप्रीम कोर्ट ने प्रतिपादित किया था। भारतीय संविधान में न्यायिक पुनर्विलोकन | की शक्ति संविधान के अनुच्छेद 13, 32 और 226 द्वारा प्रदान की गई है।
  • आच्छादन का सिद्धान्त (Doctrine of Eclipse)– यह संविधान के अनुच्छेद 13 के उपखण्ड (1) पर आधारित है। जिसके अनुसार संविधान पूर्व विधियाँ संविधान के लागू होने पर उस समय तक उस मात्रा तक मान्य नहीं होगी जहाँ तक वे मूल अधिकारों से असंगत है। ऐसे कानून समाप्त नहीं होते हैं बल्कि आच्छादन हटाने से पुनः सजीव हो जाते है।

    भिखाजी बनाम म०प्र० राज्य

अधित्याग का सिद्धान्त (Doctrine of waiver)

  • इस सिद्धान्त के अनुसार संविधान द्वारा प्रदत मूल अधिकारों का कोई व्यक्ति स्वेच्छा से त्याग नहीं सकता है। मूल अधिकार केवल व्यक्तिगत नहीं बल्कि लोकनीति के आधार पर सर्वसाधारण के लिए होते हैं। अनुच्छेद 14 इस अधिकार को वर्जित करता है।
  • सविधान के 24 वें संशोधन, 1971 के अनुसार अनुच्छेद 13(2) में किये गये संशोधन में कोई भी विधि अनु, 13 (2) में प्रयुक्त “विधि” शब्द में सम्मिलित नहीं है।
  • 1951 में शंकरी प्रसाद बनाम भारत संघ के मामले में निर्णय आया था कि अनुच्छेद 368 के तहत संविधान का संशोधन विधि के अन्तर्गत नहीं आता अत: संसद सविधान में संशोधन कर सकती है।
  • 24वें संविधान संशोधन 1971 में यह व्यवस्था दी गयो कि संसद संविधान के किसी भी भाग में संशोधन कर सकती है।

    (ii) संसद द्वारा किया गया संशोधन अनुच्छेद 13 के अन्तर्गत विधि नहीं माना जायगा।

    (iii)राष्ट्रपति सभी संविधान संशोधनों पर अनुमति देने के लिए बाध्य है।

  • 42वें संविधान संशोधन (1976) द्वारा केशवानन्द भारती बनाम केरल राज्य की कठिनाईयों को दूर करने के लिए यह व्यवस्था दो गई थी-

    (i) संसद द्वारा किये गये संविधान संशोधन की किसी भी आधार पर न्यायालय में चुनौती नहीं दी जा सकती हैं।

    (ii) संसद को संविधान संशोधन शक्ति पर काई परिसीमा नहीं हैं।

  • संसद संविधान संशोधन के मूल ढाँचे में कोई परिवर्तन नहीं कर सकती हैं। (मिनर्वा मिल बनाम भारत संघ मामले में)

मूल अधिकारों से संबंधित अनुच्छेद

    भाग-3 अनुच्छेद 12 से 35

    1. समता का अधिकार (Right to Equality) अनुच्छेद 14 से 18

    2. स्वतंत्रता का अधिकार (Right to Freedom) अनुच्छेद 19 से 22

    3. शोषण के विरूद्ध अधिकार (Right against Exploitation) अनुच्छेद 23 से 24

    4. धर्म की स्वतंत्रता का अधिकार (Right to freedom of Religion) अनुच्छेद 25 से 28

    5. संस्कृति और शिक्षा संबंधी अधिकार (Cultural and Educational Rights) अनुच्छेद 29 से 30

    6. सांविधानिक उपचारों का अधिकार (Right to Constitutional Remedies) अनुच्छेद 32

समता का अधिकार (Right to Equality)-

  • संविधान के अनुच्छेद 14 के अनुसार राज्य, भारत के राज्य क्षेत्र में किसी व्यक्ति को विधि के समक्ष समता से या विधियों के समान संरक्षण से वंचित नहीं करेगा। इस अनुच्छेद में दो प्रकार के शब्दों का प्रयोग किया गया है

1. विधि के समक्ष समता तथा विधियों के समान संरक्षण का अधिकार- यह अधिकार नागरिकों तथा गैर नागरिकों दोनों को प्रदान किया गया है। इस अनुच्छेद में दो प्रकार के अधिकारों का उल्लेख किया गया है

    (i) कानून के समक्ष समानता अर्थात् राज्य सभी व्यक्तियों के लिए एकसमान कानून बनायेगा तथा उस कानून को सभी व्यक्तियों पर एकसमान रूप से लागू किया जाएगा।

    (ii) कानून समान संरक्षण अर्थात समान परिस्थितियों में पाये जाने वाले व्यक्तियों को कानून का समान संरक्षण प्रदान किया जाएगा।

नोट- विधि के समक्ष समानता यूकं से तथा विधियों का समान संरक्षण अमेरिका सं लिया गया है।

2. धर्म, मलवंश, जाति, लिंग या जन्मस्थान के आधार पर विभेद का प्रतिषेध- इस अधिकार में नागरिकों के अतिरिक्त तथा इसके अतिरिक्त इस अधिकार के तहत भाषा या निवास स्थान के आध र पर विभेद किया जा सकता है। अन्य व्यक्तियों के संबंध में विभेद किया जा सकता है।

  • अनुच्छेद 14 के अधीन विधि का शासन संविधान का “आधारभूत ढाँचा” है, इसे 368 अनुच्छेद के तहत संशोधित नहीं किया जा सकता है।
  • अनुच्छेद में प्रयुक्त व्यक्ति से तात्पर्य है भारत के भू क्षेत्र में रहने वाले सभी व्यक्ति चाहे वे भारतीय हो या विदेशी विधि के समान संरक्षण प्रदान किया जायेगा।
  • समान कार्य के लिए समान बेतन- यह मूल अधिकार नहीं किन्तु एक सांविधानिक लक्ष्य है जो अनुच्छेद 14 के अनुसार किन्हीं दो व्यक्ति (पुरूष या महिला) के बीच बिना किसी आधार के विभेद नहीं किया जा सकता यदि ऐसा होता है तो वह अनुच्छेद 14 का अतिक्रमण करता है।
  • अनुच्छेद 15 के अनुसार धर्म, मूल वंश, जाति, लिग, जन्म स्थान के आधार पर विभेद का प्रतिषेध।
  • अनुच्छेद 14 के समानता के अधिकार का उपयुक्त उदाहरण है। अनुच्छेद 15 के अधिकार भारतीय नागरिकों को हो प्रदान किये गये हैं।
  • यहाँ विभेद शब्द का अर्थ है किसी व्यक्ति के साथ दूसरे की तुलना में प्रतिकूल व्यवहार करना।
  • अनुच्छेद 15(1) में केवल शब्द का प्रयोग है जिसका तात्पर्य है कि विभेद जन्म स्थान, धर्म, वंश, जाति, लिंग के अलावा किसी अन्य आधार पर हो तो वह मूल अधिकार के अनुच्छेद को प्रभावित नहीं करेगा। राज्य निवास और भाषा के आधार पर विभेद कर सकता है।
  • अनुच्छेद 15 के 2 (क) के सार्वजनिक स्थान का तात्पर्य है कि वह स्थान जहाँ राज्य की जनता का आवागमन होता रहता है जैसे पार्क, स्टेशन, अस्पताल, आदि।
  • अनुच्छेद 15 (3) और 4 उपखण्ड राज्य को स्त्रियों और बच्चों के लिए संरक्षणात्मक भेदभाव की आज्ञा देता है। यह स्थिति समाज में महिलाओं की लिंग नहीं बल्कि उनकी विशेष स्थिति के आधार पर वर्गीकरण किया गया है।

राष्ट्रीय महिला आयोग- सन् 1990 में संसद द्वारा राष्ट्रीय महिला आयोग अधिनियम, 1990 पारित किया गया जिसके आधार पर राष्ट्रीय महिला आयोग की स्थापना की गई।

संविधान का 93वाँ संविधान संशोधन अधिनियम 2005- अनुच्छेद 15 में खण्ड (5) जोड़ा गया कि इस अनुच्छेद की या अनुच्छेद 19(1) छः की कोई बात राज्य को सामाजिक और शैक्षिक दृष्टि से पिछड़े हुए नागरिकों के किन्हीं वर्गों की उन्नति के लिए कोई प्रावधान बनाने से नहीं रोकेगी।

अनुच्छेद 16 लोक सेवाओं में अवसर की समानता का अधिकार- यह अनुच्छेद केवल प्रारम्भिक नियुक्तियों की बात नहीं करता वरन् पदोत्रति, पदच्युति, वेतन, पदोत्तर, अवकाश, पेन्शन आदि बातें भी शामिल है।

  • यह अधिकार केवल भारतीय नागरिकों को प्राप्त है।
  • अपवाद स्वरूप राज्य को संसद द्वारा लोक नियोजन अधिनियम 1957 पारित करके यह शक्ति दी गयी थी कि वह आन्ध्रप्रदेश हिमाचल प्रदेश, मणिपुर तथा त्रिपुरा संघ में कुछ पद और सेवाओं में अहर्ता प्रदान करती है। किन्तु 1974 में यह अधिनियम समाप्त हो गया था।
  • लोक नियोजन में शर्त के रूप में निवास का उपबन्ध नहीं है। किन्तु अनुच्छेद 371 घ, में आन्ध्र प्रदेश राज्य के लिए विशेष उपबंध बनाया गया।
  • अनुच्छेद 16 (4) के अनुसार राज्य को नागरिकों के किसी पिछड़े पक्ष में जिनका प्रतिनिधित्व राज्य सेवाओं में पर्याप्त नहीं हैं नियुक्तियों या पदों के आरक्षण के लिए विशेष उपबंध करने का अधिकार देता है।

इसके लागू होने के लिए दो शर्ते है-

    (1) वर्ग पिछड़ा हों; संविधान में पिछड़ा वर्ग की कोई परिभाषा नहीं दी गयी है। किन्तु अनुच्छेद 340 राष्ट्रपति को यह शक्ति प्रदान करता है कि पिछड़े वर्गों के अवधारण के लिए आयोग की स्थापना करने की शक्ति प्रदान करता है।

    (2) अनुच्छेद 16 (4) में सामाजिक और शैक्षिक शब्दावली का प्रयोग नहीं किया गया है किन्तु पिछड़े वर्ग में अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति तथा अन्य सभी पिछड़े वर्ग के नागरिक जिसमें सामाजिक और शैक्षिक पिछड़ा वर्ग भी आता है। इसमें वह वर्ग भी सम्मिलित है जो अनुच्छेद 15 के उपखण्ड 4 में नहीं आते हैं।

मण्डल आयोग- जनता दल की सरकार में तत्कालीन प्रधान मंत्री श्री मोरारजी देसाई ने । जनवरी 1979 में पिछड़े वर्गों के निर्धारण करने के लिए श्री बी० पी० मण्डल की अध्यक्षता में द्वितीय पिछड़ा वर्ग आयोग की नियुक्ति की। दिसम्बर 1980 में मण्डल आयोग ने अपनी रिपोर्ट सौंपी।

  • हिन्दू समाज में पिछड़े वर्ग की पहचान जाति के आधार पर की जाति है। जाति के साथ पारंपरिक जीविका, निर्धनता, निवास स्थान शिक्षा का अभाव शामिल है।
  • अनुच्छेद 16 (4) में सामाजिक पिछड़ेपन की बात की गयी है।
  • किसी जाति को आरक्षण पाने का अधिकार तभी होगा जब राज्य सेवाओं में उनका पर्याप्त प्रतिनिधित्व न हों।
  • आरक्षण 50% से ज्यादा नहीं होना चाहिए।
  • पदों का आरक्षण नियुक्ति की आरंभिक स्थिति तक होना चाहिए किन्तु 77वें संविधान संशोधन में यह शर्त समाप्त कर दिया गया।
  • पिछड़े वर्गों का समय-समय पर पुनर्विलोकन होना आवश्यक है।
  • 1991 में नरसिंहराव सरकार में दो परिवर्तन किये गए

    1. आरक्षण का आधार आर्थिक माना।

    2. निम्न आय वर्ग के लोगों को 10% का अतिरिक्त आरक्षण।

राम नंदन समिति- अन्य पिछड़े वर्गों में विशिष्ट वर्गों की पहचान के लिए इस समिति का गठन किया गया, समिति ने अपनी रिपोर्ट 1993 में प्रस्तुत की थी।

राष्ट्रीय आयोग का गठन- संसद के अधिनियम द्वारा आरक्षण के लिए 1993 में राष्ट्रीय आयोग का गठन किया गया ।

77वाँ संविधान संशोधन- इस संशोधन का उद्देश्य था कि मण्डल आयोग के मामले में दिए गये निर्णय को समाप्त करना। तथा इसके द्वारा संविधान के अनुच्छेद 16 में उपखण्ड 4क जोड़ा गया है।

81वाँ संविधान संशोधन 2000- इस संशोधन द्वारा अनुच्छेद 16 के खण्ड 4 क के पश्चात् एक नया खण्ड 4 ख जोड़ा गया जिसके द्वारा अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजातियों तथा अन्य पिछड़े वर्गों के लिए सरकारी नौकरियों में 50% की सीमा को समाप्त कर दिया गया है।

85वाँ संविधान संशोधन 2001- सरकारी नौकरियों में प्रोन्नति किसी वर्ग की प्रोन्नति के मामले में के स्थान पर शब्दावली परिणामस्वरूप वरिष्ठता को जून 1995 से प्रभावी (77 संशोधन से) मानने की व्यवस्था है।

  • अनुच्छेद 16 में एक तीसरा अपवाद यह है कि अनुच्छेद I6 के उपखण्ड (1) और (2) में प्रावधान है कि लोकपड़ों में धर्म के आधार पर असमानता करना वर्जित है। किन्तु इस अनुच्छेद के उपखण्ड 5 में प्रावधान किया गया है कि राज्य अपनी भाषा, शैक्षणिक अर्हता, शारीरिक स्वास्थ्य तथा साक्षात्कार के आधार पर सरकारी नौकरियों में भेद कर सकता है।
  • अनुच्छेद 17 अस्पृश्यता का अन्त (Abolition of untouchability)- इस अनुच्छेद में ‘अस्पृश्यता का अंत किया जाता है और उसका किसी भी रूप में आचरण निषिद्ध किया जाता है।
  • संसद ने अपने अधिकारों का प्रयोग करके 1955 में अस्पृश्यता अधिनियम पारित किया था। जिसमें 1976 में संशोधन करके इसका नाम सिविल अधिकार संरक्षण अधिनियम 1955″ कर दिया गया है।
  • अस्पृश्यता शब्द के अर्थ की व्याख्या न तो संविधान में है और न ही न्यायालय में की है किन्तु यह माना जा सकता है जैसे जन्म, रोग, मृत्यु, एवं अन्य कारण हो सकते है। यह सामाजिक बुराई है जो जाति-प्रथा पर आधारित है।
  • यह अधिकार प्राइवेट व्यक्तियों के लिए भी उपलब्ध है कि राज्य का संवैधानिक कर्तव्य हैं कि वह इन अधिकारों के उल्लंघन रोकने के लिए रोक लगा कर दंडित करें।

अनुच्छेद 18- उपाधियों का अन्त (Abolition of titles)- अनुच्छेद 18 राज्य के किसी भी व्यक्ति को, चाह वह नागरिक हो या विदेशी सैन्य और शैक्षणिक उपाधि को छोड़कर कोई उपाधि नहीं धारण करेगा।

  • राज्य को सामाजिक सेवा के लिए कोई सम्मान या पुरस्कार देने से रोक नहीं लगाया गया है। बल्कि यह सम्मान या पुरस्कार वह अपने नाम के साथ नहीं प्रयोग करेगा।
  • अनुच्छेद के चौथे उपखण्ड में प्रावधान किया गया है कि राज्य के अधीन किसी लाभ के पद पर आसीन व्यक्ति किसी अन्य देश से भता, उपहार, सुविधाएँ तब तक स्वीकार नहीं करेगा जब तक राष्ट्रपति की मंजूरी न हों।
  • 1954 में दो अधिसूचनाओं द्वारा भारत सरकार ने कई प्रकार के अलंकरण प्रारम्भ किया था:

    1. भारत रत्न                                  2. पद्म विभूषण

    3. पद्म भूषण                                 4. पद्म श्री।

  • किन्तु जनता पार्टी सरकार ने 1977 में इन उपाधियों का अन्त कर दिया लेकिन जनता पार्टी की सरकार के समाप्त होने के पश्चात 1980 में पुन: आरम्भ किया गया। 1996 में सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि भारत रत्न, पद्म विभूषण, पद्म भूषण, पद्म श्री. आदि अलकरण सामंतवादी उपाधियाँ नहीं है।
  • अनुच्छेद 18 के उल्लंघन होने पर किसी दण्ड का प्रावधान नहीं हैं।

स्वतंत्रता का अधिकार (Right to freedom)

  • भारतीय संविधान के अनुच्छेद 19 से 22 तक में नागरिकों को दैहिक स्वतंत्रता सम्बन्धी अधिकार प्रदान किये गये हैं। यह मूल अधिकारों का आधार स्तम्भ है।
  • संविधान के अनुच्छेद 19 के तहत 7 मूल अधिकार का प्रावधान था किन्तु 44 वां संविधान संशोधन 1978 में संपत्ति के अधिकार को समाप्त कर दिया गया अर्थात अनुच्छेद 19(1) के उपखंड च का लोप कर दिया गया।

अनुच्छेद 300 क- संविधान के भाग 12 में 1978 में एक नया अध्याय ‘सम्पत्ति का अधिकार’ नाम से जोड़ा गया हैं। जिसमें यह प्रावधान है कि “किसी भी व्यक्ति को कानून के प्राधिकार के बिना सम्पत्ति के अधिकार से वंचित नहीं किया जायेगा । “

वाक् स्वतन्त्रता आदि विषयक अधिकार-

  • वर्तमान में अनुच्छेद 19 के तहत स्वतंत्रता के 6 अधिकार हैं।

    वाक् और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता- इसका भारत के सभी नागरिकों को अपने विचार, शब्द, लेख, पत्र, मुद्रण, चिन्ह, या अन्य किसी भी प्रकार से वह अपने विचारों को व्यक्त करने की स्वतंत्रता प्रदान करता है।

  • भाषण और विचारों के अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के साथ “प्रेस की स्वतंत्रता “ भी शामिल है हालाकि अनुच्छेद में इसका उल्लेख नहीं है।
  • प्रेस की स्वतंत्रता के अन्तर्गत विज्ञापन और सिनेमा को नहीं माना जाता है।
  • भारत में प्रथम प्रेस आयोग 1954 के सुझावों के आधार पर 1956 में प्रेस परिषद अधिनियम पारित किया गया है। यह परिषद सरकार की और तथा विरोध दोनों तरफ से सामाजिक पत्रों की शिकायतें सुनता है।

सूचना का अधिकार अधिनियम- सर्वप्रथम 5 दिसम्बर 2002 को राष्ट्रीय लोकतांत्रिक गठबन्धन सरकार द्वारा सूचना का अधिकार अधिनियम पारित किया गया था। किन्तु 2005 में इस अधिनियम को निरस्त कर इसकी जगह 12 अक्टूबर 2005 से सूचना का अधिकार अधि नियम 2005 पारित हुआ।

  • सूचना अधिकार अधिनियम का मुख्य उद्देश्य देश के नागरिकों को लोक प्राधिकारियों के पास सरकारी कामकाज से सम्बन्धित सूचनाओं को प्राप्त करने का प्राधिकार देता है।
  • इस अधिनियम के दायरे में केन्द्र, राज्य सरकारें स्थानीय और कार्यपालिका के साथ न्यायपालिका व विधायिका भी आती है। इसके अलावा, सरकार के स्वामित्व व नियन्त्रण वालो प्रत्यक्ष, परोक्ष रूप से वित्तीय मदद वाले निकाय गैर सरकारी संस्थाएं तथा सरकारी वित्तीय सहायता वाली निजी संस्थाएं शामिल है।
  • कानून के तहत अधिकारियों को 30 दिन के अन्दर लोगों को सूचना उपलब्ध कराना होगा।
  • जीवन से जुड़ी सूचना 48 घंटे के भीतर उपलब्ध कराने का प्रावधान है। ऐसा न हान पर अधिकारी के खिलाफ दण्ड का प्रावधान किया गया है।

राष्ट्रीय ध्वज फहराना नागरिकों को मूल अधिकार में शामिल- 22 जनवरी 2004 को सर्वोच्च न्यायालय ने भारत संघ बनाम नवीन जिंदल के मामले में निर्णय दिया है कि देश के सभी नागरिकों द्वारा अपने घर, दफ्तर, आदि पर राष्ट्रीय ध्वज फहराना अनुच्छेद 19 (1) के तहत मूल अधिकार है।

  • किन्तु अनुच्छेद 19 के उपखण्ड (2) के तहत यह अधिकार आत्यन्तिक (absolute) नहीं है इस पर युक्ति युक्त निर्बंधन लगाये जा सकते है।
  • फोन टेप करना मूल अधिकार का उल्लघन करना है।

2. शांतिपूर्ण तथा निरायुध सम्मेलन की स्वतंत्रता:

  • लोकतन्त्रात्मक व्यवस्था में सभाएं, जुलूस, प्रदर्शन और हड़ताल जनता के मुख्य हथियार है। किन्तु अनुच्छेद 19 (1) के तहत केवल उन्हीं प्रदर्शनों को संरक्षण प्रदान करता है जो हिसात्मक तरीके से न किया गया हों । किन्तु प्रदर्शन करने से पहले लोक व्यवस्था के हित में सरकार से आज्ञा लेना आवश्यक है।
  • हड़ताल का अधिकार कोई मूल अधिकार नहीं है भारत की प्रभुता और अखण्डता तथा लोक व्यवस्था के हित में युक्ति-युक्त बन्धन लगाये जा सकते है।

संगम या संघ बनाने की स्वतन्त्रता- सभी नागरिकों का संगठन या समिति बनाने की स्वतंत्रता प्राप्त है। किन्तु यदि यह संगठन लोक व्यवस्था में अवरोध उत्पन्न करता है तो इस आधार पर प्रतिबन्ध लगाया जा सकता है।

  • इस अधिकार के अन्तर्गत सैनिकों और वेश्याओं को संघ बनाने की स्वतन्त्रता नहीं है।

भारत के राज्य क्षेत्र में सर्वत्र अबाध संचरण- इस स्वतन्त्रता के दो भाग है-(क) देश के अन्दर (ख) देश के बाहर भ्रमण करने का अधिकार किन्तु अनुच्छेद 19 (1) केवल देश के अन्दर भ्रमण का अधि कार देता है।

    भारत के राज्य क्षेत्र के किसी भाग में निवास करने और बस जाने की स्वतन्त्रता- यह अधिकार देश के अन्दर कहीं भी जाने, अस्थायी रूप से रहने और किसी भी हिस्से में व्यवस्थित होने का अधिकार देता है किन्तु राज्य आम लोगों के हितों में तथा अनुसूचित जनजातियों संस्कृति रिवाज के हितों की रक्षा के लिए बाहरी लोगों को उनके क्षेत्र में प्रवेश प्रतिबन्धित करता है।

कोई वृत्ति, उपजीविका, व्यापार या कारोबार करने का अधिकार यह अधिकार– बहुत विस्तृत है क्योंकि यह नागरिकों को जीवन चलाने के लिए अधिकार देता है। किन्तु राज्य को साधारण हितों की रक्षा के लिए | प्रतिबन्धित करने या इसकी स्वतंत्रता के सम्बन्ध आवश्यक योग्यता निर्धारित करने की शक्ति प्रदान करती है।

फुटपाथों पर व्यापार करना मूल अधिकार हैं। नगरपालिका की धार्मिक और सांस्कृतिक पृष्ठभूमि पर ऋषिकेष, हरिद्वार व मूनी की सीमा में अण्डों की बिक्री पर प्रतिबन्ध लगाया गया हैं।

अनुच्छेद 19 (2) में निम्न आधारों पर प्रावधान है जिस आधार पर वाक और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर निर्बन्धन लगाये जा सकते हैं।

(i) राज्य की सुरक्षा- जिसमें आन्तरिक विद्रोह राज्य के विरूद्ध युद्ध छेड़ना, बगावत आदि से राज्य की सुरक्षा का खतरा होने पर।

(ii) विदेशी राज्यों के साथ मैत्रीपूर्ण सम्बन्धों के हितों में-

(iii) लोक व्यवस्था (Public Order)- यह एक ऐसी स्थिति में जिससे आम जनता पर प्रभाव पड़ता है। लोक व्यवस्था को 1951 के प्रथम संविधान संशोधन के द्वारा प्रतिबंध लगाने के आधार पर शामिल किया लेकिन इसमें साधारण उल्लंघन शामिल नहीं है।

(iv) शिष्टाचार और सदाचार (Decency or Morality)- इसको इसलिए सम्मिलित किया गया है ताकि समाज को अश्लील, भ्रष्ट तथा अनैतिक विचारों से समाज को बचाया जा सकें।

(v) न्यायालय की अवमानना (Contempt of Court)- संविधान के अनुच्छेद 129 तथा 215 क्रमशः उच्चतम न्यायालय | तथा उच्च न्यायालयों को उनको अवमानना के लिए दण्ड देने का अधिकार है।

(vi) मानहानि– कोई भी कथन या प्रकाशन जो किसी व्यक्ति की प्रतिष्ठा को क्षति पहुँचाता है, किसी व्यक्ति को समाज में घृणा, | मजाक, अपमान का पात्र बनाता हैं। अनुच्छेद 19 (2) के तहत उस पर राज्य प्रतिबन्ध लगाये जा सकते हैं।

(vii) अपराध के लिए प्रोत्साहित करना- (Incitement to an offence)- प्रथम संविधान संशोधन 1951 द्वारा यह अधि नियम में 1951 द्वारा जोड़ा गया था।

(viii) भारत की संप्रभुता और अखण्डता- संविधान के 16 संशोध न अधिनियम 1963 द्वारा जोड़ा गया है।

अनुच्छेद 20 अपराधों के लिए दोषसिद्ध के सम्बन्ध में संरक्षण-

  • ऐसे व्यक्ति जिन पर अपराध करने का अभियोग लगाया गया है, अनुच्छेद 20 ऐसे दोषी व्यक्ति की सुरक्षा की व्यवस्था करता है।

(i) किसी व्यक्ति को किसी अपराध के लिए विधि के अन्तर्गत विहित अपराध के लिए दोषी ठहराया जायेगा।

(ii) किसी व्यक्ति को एक ही अपराध के लिए एक से अधिक बार अभियोजित और दण्डित नहीं किया जायेगा।

(iii) आत्म-अभिशंसन (Self-Dis crimination)- किसी भी व्यक्ति को जिस पर कोई अपराध लगाया गया है. उसे अपने विरूद्ध साक्ष्य के लिए बाध्य नहीं किया जायेगा।

  • यदि वह स्वंय साक्ष्य के लिए अपनी इच्छा से तैयार हो तो इसका उल्लंघन नहीं है। किसी अपराध के लिए अभियुक्त के परिसर की तलाशी के वारंट के तहत तलाशी लेना उल्लंघन नहीं है।

अनुच्छेद 21 प्राण और दैहिक स्वतंत्रता का संरक्षण:-

    यह अधिकार नागरिकों और गैर नागरिकों दोनों को प्राप्त है। यह अनुच्छेद विधायिका और कार्यपालिका दोनों के विरूद्ध संरक्षण प्रदान करता है।

उच्चतम न्यायालय द्वारा अनुच्छेद 21 के तहत निम्न अधिकारों को माना है-

(i) जीवन रक्षण का अधिकार

(ii) मानवीय गरिमा के साथ जीने का अधिकार

(iii) प्रत्येक व्यक्ति को आजीविका का अधिकार

(iv) स्वच्छ पर्यावरण और प्रदूषण रहित पानी और हवा में जीने का अधिकार

(v) एकान्तता का अधिकार (Right of Privacy) (vi) निःशुल्क कानूनी सहायता का अधिकार

(vii) हिरासत में शोषण के विरूद्ध अधिकार

(viii) उचित स्वास्थ्य और इलाज का अधिकार

(ix) विदेशी यात्रा का अधिकार

(x) 14 साल की उम्र तक नि:शुल्क कानूनी सहायता का अधिकार

(xi) अमानवीय व्यवहार के विरूद्ध अधिकार

(xii) अपील करने का कानूनी अधिकार

(xiii) वयस्क बालक एवं बालिका को स्वेच्छा से अन्तर्जातीय विवाह का अधिकार

(xiv) गर्भधारण के पूर्व लिंग का चुनाव महिला के जीवन के अधिकार का उल्लंघन

(xv) सार्वजनिक स्थान पर धूम्रपान का निषेध

(xvi) महिलाओं का यौन उत्पीड़न से संरक्षण-

नोट:- अनुच्छेद 21 में मरने का अधिकार सम्मिलित नहीं हैं। जीवन जीने के अधिकार जिसमें गरिमामय जीवन भी आता है, का तात्पर्य ऐसे अधिकार से हैं, जो प्राकृतिक जीवन के अन्त तक है अर्थात गरिमापूर्ण प्राकृतिक मृत्यु शामिल है।

भारतीय दण्ड संहिता 300 के तहत आत्महत्या का प्रयास करना असंवैधानिक, अवैध और दण्डनीय अपराध है किन्तु अब हटा दिया गया।

    86वाँ संविधान संशोधन अधिनियम 2002- इस संशोधन द्वारा अनुच्छेद 21 में (क) जोड़ा गया है जो यह उपबन्धित करता है कि राज्य विधि बनाकर 6 वर्ष की आयु से 14 वर्ष की आयु के सभी बालकों के लिए निःशुल्क और अनिवार्य शिक्षा के लिए उपबन्ध करेगा।

    अनुच्छेद 22- बन्दीकरण एवं निरोध के विरूद्ध सांविधानिक संरक्षण- किसी व्यक्ति को गिरफ्तारी और निरोध से अनुच्छेद 22 द्वारा संरक्षण प्रदान किया गया है। इस अनुच्छेद के खण्ड (1) एवं (2) सामान्य दण्ड-विधि के अधीन गिरफ्तारियों से तथा खण्ड (3), (4). (5). (6), (7) निवारक निरोध विधि के अधीन गिरफ्तारी है।

गिरफ्तार व्यक्ति का संरक्षण:-

(i) गिरफ्तारी के कारण शीघ्र जानने का अधिकार।

(ii) अपनी पसन्द के अधिवक्ता से बचाव तथा विचार विमर्श का अधिकार।

(iii) जिस व्यक्ति को गिरफ्तार किया गया है उसे 24 घण्टे के अन्दर किसी निकटतम मजिस्ट्रेट के समक्ष पेश किया जाय।

नोट:- उक्त खण्ड के अधीन प्राप्त अधिकार शत्रु-देश के व्यक्तियों और निवारक अधिनियम के तहत गिरफ्तार व्यक्तियों पर लागू नहीं है। किन्तु शत्रु देश का व्यक्ति खण्ड (4) और (5) के अर्धान संरक्षण का दावा कर सकता है किन्तु उक्त अधिकार संसद द्वारा विधि के अधीन होग।

निवारक निरोध अधिनियम- अनुच्छेद 22 के तहत प्राप्त अधिनियम खण्ड (3) से (7) तक में प्रावधान किया गया है किन्तु निवारक निरोध अधिनियम को परिभाषित नहीं किया गया है। किन्तु इनका उद्देश्य है कि किसी अपराध को किये जाने से रोका जाय और अपराध करने वाले सम्भावित व्यक्ति को गिरफ्तार किया जाए। अब तक संसद द्वारा निम्न अधिनियम पारित किये गये है।

1. निवारक निरोध अधिनियम 1950 (Preventive Detention Act 1950)- यह अधिनियम 31 दिसम्बर 1969 तक अस्तित्व में था।

2. आन्तरिक सुरक्षा व्यवस्था अनिधियम 1971 (Maintenance of Internal Security Act-MISA)- यह अधिनियम अप्रैल 1979 में समाप्त हो गया।

3. राष्ट्रीय सुरक्षा अधिनियम 1980 (National Security Act.)- NSA

4. विदेशी मुद्रा संरक्षण तथा तस्करी निवारण अधिनियम- 1974 (COFEPOSA)- आर्थिक क्षेत्र में इसे राष्ट्रीय सुरक्षा कानून का दर्जा प्राप्त है।

5. आतंकवादी एवं विध्वंसक गतिविधियों अधिनियम (TADA) 1985- Terrorist and Disruptive Activities Prevention Act.

  • उत्तर प्रदेश देश का प्रथम राज्य है जिसने इतने कठोर प्रावधान वाले इस कानून को समाप्त करने की घोषणा की थी, यह अधिनियम 23 मई 1995 में समाप्त हो गया।
  • TADA के स्थान पर 2 अप्रैल 2002 को एक नया आतंकवाद निरोधी अधिनियम लागू किया गया। 21 सितम्बर 2004 को जारी अध्यादेश के जरिये इस अधिनियम को रद्द कर दिया गया। आतंकवादी निरोधी अधिनियम (Prevention of Terrorism Co Act – POTA) – 2002। इसे 2004 में कांग्रेस की सरकार द्वारा हटाया गया।

6. आतंकवादी निरोधी अधिनियम (Prevention of Terrorism Act – POTA) -2002। इसे 2004 में कांग्रेस की सरकार द्वारा हटाया गया।

अनुच्छेद 23- शोषण के विरूद्ध अधिकार (Right against exploitation)

  • अनुच्छेद 23 में मानव के क्रय-विक्रय बेगार और वलात्श्रम को प्रतिषेध का प्रावधान किया गया है। इस प्रकार का संरक्षण नागरिकों और गैर नागरिकों को दोनों प्रदान किया गया हैं
  • अनुच्छेद 23 प्रत्येक प्रकार के बालश्रम (Forced Labour) को प्रतिबन्धित करता है। यदि किसी व्यक्ति को अपनी इच्छा के विरूद्ध या दवाव से कार्य करना पड़ता है भले ही उसे उसके बदले पारिश्रमिक मिला हो बलात्श्रम माना जायेगा।
  • राज्य द्वारा इसके लिए संसद अधिनियम द्वारा बन्धुआ मजदूर प्रणाली उन्मूलन अनिधियम, 1976 पारित किया गया है।
  • इस अनुच्छेद 23 का अपवाद है कि राज्यों को सार्वजनिक प्रयोजन के लिए अनिवार्य सेवाएँ लागू करने की शक्ति प्रदान करता है। जैसे सैनिक सेवा और सामाजिक सेवाएँ न तो वेगार है और न मानव-व्यापार।
  • अनुच्छेद 24- कारखानों आदि में बालकों के नियोजन का प्रतिषेध करता है। इसका तात्पर्य है कि राज्य किसी फैक्ट्री , खान एवं समान निर्माण कार्य या रेलवे में 14 साल से कम उम्र के बच्चों के रोजगार पर प्रतिबंध लगाता है।
  • इसके लिए बाल श्रम प्रतिबंधित एवं नियमितकरण अधिनियम 1986 पारित किया गया है।
  • 1996 उच्चतम न्यायालय ने बाल श्रम पुनर्वास कल्याण फण्ड की स्थापना की।

बाल अधिकार संरक्षण आयोग – संसद की अधिसूचना के आधार पर 23 फरवरी 2007

धर्म की स्वतंत्रता का अधिकार-(Right to freedom of Religion) अनुच्छेद 25- अन्त: करण की और धर्म के अवाध रूप से मानने आचरण और प्रचार करने की स्वतंत्रता का उपबंध देती है।

  • अनुच्छेद 25 (1) के अनुसार सभी व्यक्तियों को अंत: करण की स्वतंत्रता का अधिकार तथा किसी भी धर्म का मानने, आचरण करने और प्रचार करने का समान हक होगा- यहाँ अन्तः करण का तात्पर्य आत्यन्तिक (absolute) आन्तरिक स्वतन्त्रता से हैं जिसके माध्यम से व्यक्ति अपनी इच्छानुसार ईश्वर के साथ सम्बन्धों को स्थापित करता है।
  • वतर्मान समय में किसी व्यक्ति को धर्म परिवर्तन करने पर मजबूर करना अपराध है।
  • अनुच्छेद 26- व्यक्तियों को लोक व्यवस्था, सदाचार और स्वास्थ्य के अधीन रहते हुए प्रत्येक धार्मिक संप्रदाय या उसके किसी अनुभाग को

(i) अपने धार्मिक संस्थाओं की स्थापना और पोषण

(ii) धर्म विषयक कार्यों का प्रबंध करना

(iii) धार्मिक सम्प्रदाय का सम्पत्ति के अर्जन और प्रशासन का अधिकार

(iv) अर्जित सम्पत्ति का विधि के अनुसार प्रशासन करना।

  • अनुच्छेद 26(4) के प्रावधान में विधायिका हस्तक्षेप नहीं कर सकती है।
  • अनुच्छेद 27 के अनुसार यह उपबन्ध है कि किसी विशेष धर्म की उन्नति के लिए कोई विशिष्ट कर न देने को स्वतन्त्रता है।
  • इस अनुच्छेद में कर से तात्पर्य एक अनिवार्य धन की वसूली करना जो उनके लाभ के लिए होता है। जबकि शुल्क सार्वजनिक प्रयोजन के लिए लिया जाता है।
  • अनुच्छेद 28 शिक्षा संस्थाओं में धार्मिक शिक्षा या उपासना में उपस्थित होने का निषेध करता है।

    यह अनुच्छेद में 4 प्रकार की शैक्षिक संस्थाओं का उल्लेख करता है-

(i) ऐसी शिक्षण संस्था जिसे राज्य पूरी तरह से पोषित करें।

(ii) ऐसी संस्था जिसे राज्य ने मान्यता प्रदान की हो।

(iii) ऐसी शिक्षण संस्था जिसे राज्य निधि से सहायता प्राप्त होती हो।

(iv) राज्य द्वारा प्रशासित किन्तु किसी धर्म या न्यास के अधीन संस्थाएँ।

संस्कृति और शिक्षा सम्बन्धी अधिकार-

अनुच्छेद 29 अल्पसंख्यक वर्गों के हितों का संरक्षण करता है- अनुच्छेद 29 (1) भारत क्षेत्र में रहने वाले नागरिकों के किसी भी वर्ग को जिनकी अपनी भाषा, लिपि या संस्कृति है उसे बनाये रखने का अधिकार प्रदान करता है।

  • इसी अनुच्छेद 29 (2) के अनुसार राज्य द्वारा सहायता प्राप्त या मान्यता प्राप्त किसी भी शिक्षा संस्था में केवल धर्म मूलवंश, जाति या भाषा के आधार पर प्रवेश देने से नहीं रोक सकता है।
  • अनुच्छेद 30 यह उपबन्धित करता है कि भाषा या धर्म पर आधारित सभी अल्पसंख्यक वर्गों को अपनी रूचि की शिक्षण संस्थाओं की स्थापना और प्रबंधन का अधिकार होगा।
  • यह अनुच्छेद अल्पसंख्यकों के अधिकारों को रक्षा करता है। किन्तु यह अधिकार नियामक शक्ति के अधीन है। इस प्रकार समाजकल्याण, औद्योगिक संबंधों, शैक्षिक स्तरीं, कार्य कुशलता अनुशासन, स्वास्थ्य, स्वच्छता, लोक व्यवस्था, और सदाचार के हित में बनाई गई विधि अनुच्छेद 30 का उल्लंघन तब तक नहीं करती जब तक अल्पसंख्यकों को संस्था का प्रबंध करने के उनके अधिकार से वंचित नहीं करती है।
  • अनुच्छेद 31 संपत्ति का अनिवार्य अर्जन (44वां संविधान संशोधन अधिनियम, 1978) समाप्त कर दिया गया।

संवैधानिक उपचारों का अधिकार

(Right to Constitutional Remedies)

  • अनुच्छेद 32 में संवैधानिक उपचारों का अधिकार दिया गया है। संविधान में जहाँ मूल अधिकार की व्याख्या की गयी है वहां मूल अधिकार को लागू कराने के लिए समुचित कार्यवाही द्वारा देश के उच्चतम न्यायालय को इन अधिकारों को प्रवर्तित कराने की गारंटी देता है।
  • इसके लिए उच्चतम न्यायालय समुचित निर्देश, रिट जिसके अन्तर्गत बन्दी प्रत्यक्षीकरण, परमादेश, प्रतिषेध, अधिकार पृच्छा, उत्प्रेषण और समान प्रकार के रिट जारी करने की शक्ति प्रदान करता है। यह अनुच्छेद उच्चतम न्यायाल को नागरिकों के मूल अधिकारों का सजग प्रहरी बना देता हैं।
  • अनुच्छेद 32 के उपबन्धों के अनुसार उच्चतम न्यायालय की अधिकारिता संविधान का आधारभूत ढाँचा है, इसे अनुच्छेद 368 के अधीन संशोधन द्वारा नष्ट नहीं किया जा सकता है।
  • डा० भीमराव अम्बेडकर ने अनुच्छेद 32 को संविधान की मूल आत्मा तथा मर्म बताया है।

लोक हित वाद (Public Interest Litigation)- लोक हित वाद का उद्देश्य समाज के किसी वर्ग अधिकारों या अन्य अधिकारों या प्रमुख रूप से निर्बल एवं निर्धन व्यक्तियों के मूल अधिकारों का जो अनुच्छेद 21 के अधीन प्रदत्त हैं; के मूल अधिकारों या अन्य अधिकारों का संरक्षण करता है।

  • भारत में इसके प्रयोग की शुरूआत 1970 के उत्तरार्द्ध से हुई तथा वाद को प्रारंभ करने का श्रेय न्यायमूर्ति पी० एन० भगवती और न्यायमूर्ति वी० आर० कृष्ण अय्यर का रहा है। जनहित के मामले में समाज का कोई भी व्यक्ति या कोई भी पंजीकृत सोसाइटी, गैर राजनीतिक स्वैच्छिक संघ अनुच्छेद 32 के अधीन उपचार के लिए न्यायालय में आवेदन दे सकता है।

न्यायिक सक्रियता (Judicial Activism)- यदि कार्यपालिका विधानमण्डल द्वारा बनायौं गई विधियों को लागू नहीं करती हैं और उनकी उपेक्षा करती हैं तो नागरिकों के मूल अधिकारों की सुरक्षा के लिए संविध न न्यायपालिका को हस्तक्षेप करने का अधिकार देता है। न्यायालय जनहित के मामले में सरकार और प्राधिकारियों को संविधान और अन्य कानून के तहत कर्तव्य पालन के लिए विवश करता है उच्चतम न्यायालय की इस कार्यवाही को न्यायिक सक्रियता कहा जाता है।

  • अनुच्छेद 137 के आधार पर उच्चतम न्यायालय अनुच्छेद 32 के अधीन अपने अन्तिम निर्णय को या दिए गए आदेश का पुनर्विलोकन (Review) या उपचारात्मक याचिका (Curative Petition) के माध्यम से चुनौती दी जा सकती है।
  • यदि किसी मामले पर अनुच्छेद 32 के अधीन निर्णय दिया जा चुका है तो उसी मामले को अनुच्छेद 226 के अधीन नहीं उठाया जा सकता हैं। किन्तु पूर्व न्याय का सिद्धान्त (Res. Judicata) बन्दी प्रत्यक्षीकरण’ रिट के मामले में लागू नहीं होता है।
  •  अनुच्छेद 226 के अन्तर्गत हमारे उच्च न्यायालयों को उपयुक्त प्रकार की रिटों को जारी करने का अधिकार प्राप्त है। उच्च न्यायालय की यह शक्ति उच्चतम न्यायालय की अपेक्षा विस्तृत है।
  • मूल अधिकारों के उल्लंघन के मामले में पिटीशनर दोनों न्यायालयों में से किसी भी न्यायालय में जा सकता हैं।

अनुच्छेद 32 में दिये गये मूल अधिकार का उल्लंघन या निलम्बन- संविधान में केवल एक परिस्थिति का उल्लेख किया गया है जब इस अनुच्छेद का निलम्बन किया जा सकता है। अनुच्छेद 352 के अन्तर्गत आपात की उदघोषणा की गई हो तो अनुच्छेद 359 के अन्तर्गत राष्ट्रपति द्वारा भाग 3 में दिये गये प्रदत्त अधिकारों को प्रवर्तित करने के लिए किसी न्यायालय के प्रचालन अधिकार को जब तक उदघोषणा लागु रहती है विलम्बित करने की घोषणा कर सकती है।

  • जब देश में अनुच्छेद 358 के तहत राष्ट्रीय आपात वाह्य आक्रमण या युद्ध से देश में लागू किया गया हों तो अनुच्छेद 19 के अधीन मूल अधिकारों का स्वत: निलम्बन हो जाता है।

44वाँ संविधान संशोधन 1978 के आधार पर अनुच्छेद 359 के तहत दो परिवर्तन किये गये हैं- (1) आपात उद्घोषणा के दौरान राष्ट्रपति अनुच्छेद 359 के अधीन अनुच्छेद 21 द्वारा प्रदत्त प्राण एवं दैहिक स्वाधीनता के अधिकार को न्यायालयों द्वारा प्रवर्तित कराये जाने के अधि कार को निलम्बित करने की शक्ति न होगी।

  • अनुच्छेद 33 के तहत विधि निर्माण का अधिकार सिर्फ संसद को है राज्य विधान मंडल को नहीं है।
  • संसद अपनी इस शक्ति का प्रयोग करके सशस्त्र बलों के सदस्यों, सुरक्षा बल के सदस्यों, अर्धसैनिक, पुलिस एवं खुफिया एजेंसियों के मूल अधिकारों पर युक्ति युक्त प्रतिबंध लगाती है। इस आधार पर संसद द्वारा सैन्य अधिनियम (1950) पुलिस बल अधिनियम (1966), वायु और जल सेना अधिनियम (1950) बनाए गयें।

मार्शल लॉ- अनुच्छेद 34 के आधार पर भारत में कहीं भी युद्ध, अशांति दंगे या कानून का उल्लंघन होने पर मार्शल लॉ लागू किया जाता हैं। इसका शाब्दिक अर्थ सैन्य शासन हैं।

  • यह सैन्य शासन सिर्फ मूल अधिकारों को प्रभावित करता है।
  • देश के कुछ विशेष क्षेत्र में लागू किया जा सकता है।
  • यह सरकार एवं साधारण कानूनी न्यायालयों को निलंबित करता है।
  • अनुच्छेद 34 के अधीन संसद द्वारा निर्मित विधि (Indemnity Act) को इस आधार पर न्यायालय में चुनौती दी जा सकती है कि वह मूल अधिकारों का उल्लंघन करता है।

44 वाँ संविधान संशोधन अधिनियम- 1978 अनुच्छेद 31, सम्पत्ति के अधिकार जो मूल अधिकार था निरस्त कर दिया गया है और विधिक अधिकार बना दिया गया तथा भाग 12 के 300क में शामिल कर दिया गया है।

PIL क्या है?

भारतीय न्यायपालिका- Locus Stande (जिसके अधिकारों का उल्लंघन होता है कंवल वही याचिका डाल सकता है) को नकारता है। SC कहता है कि सार्वजनिक मुद्दे पर कोई भी व्यक्ति या संस्था याचिका डाल सकता है। भारतीय न्यायपालिका सहयोगात्मक रवैया अपनाते हुए यह भी कहा कि पत्र के माध्यम से भी याचिका डाली जा सकती है। भारतीय न्यायपालिका Contering Mandmus के सिद्धांत पर कार्य करती है। इसका आशय यह है न्यायपालिका खुद मामलों पर ध्यान रखती है तथा परिस्थितियों के अनुसार निर्णय देतो है।

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