संविधान की उद्देशिका (Part 7)

किसी भी देश के संविधान का वह पहला कथन जिसमें संविधान के बुनियादी मूल्यों और अवधारणाओं को स्पष्ट रूप से व्यक्त किया जाता है, वह संविधान की प्रस्तावना कहलाता है।

    जो मूल्य भारतीय स्वतंत्रता संग्राम का आधार बने और जिनसे इस स्वाधीनता की प्रेरणा मिली थी, वे ही भारतीय लोकतंत्र के आधार बने। भारतीय संविधान के शुरूआत में इन्हीं बुनियादी मूल्यों को एक छोटी सी उद्देशिका में बताया गया है।

    जवाहरलाल नेहरू द्वारा 13 दिसम्बर 1946 को प्रस्तुत एवं 22 जनवरी 1947 को स्वीकृत उद्देश्य प्रस्ताव और ऑस्ट्रेलिया का संविधान हमारी उद्देशिका का स्रोत है। 22 जनवरी 1947 को संविधान सभा ने जिस उद्देश्य प्रस्ताव को अंगीकृत किया था । यही उद्देश्य प्रस्ताव संविधान की प्रस्तावना का आधार बना।

उद्देशिका

हम, भारत के लोग, भारत को एक संपूर्ण

प्रभुत्व-संपन्न, समाजवादी, पंथ निरपेक्ष लोकतंत्रात्मक

गणराज्य बनाने के लिए तथा उसके समस्त नागरिकों को:

 सामाजिक, आर्थिक और राजनैतिक न्याय,

विचार, अभिव्यक्ति, विश्वास, धर्म

और उपासना की

स्वतंत्रता,

प्रतिष्ठा और अवसर की समता,

प्राप्त कराने के लिए,

तथा उन सब में व्यक्ति की गरिमा और

राष्ट्र की एकता और अखंडता

सुनिश्चित करने वाली बंधुता बढ़ाने के लिए

दृढ़ संकल्प होकर अपनी इस संविधान सभा में

आज तारीख 26 नवम्बर, 1949 ई.

को एतद्द्वारा इस संविधान को अंगीकृत,

अधिनियमित और आत्मार्पित करते है।

भारतीय संविधान की उद्देशिका में कुछ मुख्य तत्व है:- जिसमें

    1. हम भारत के लोग अर्थात संविधान का निर्माण भारत की जनता द्वारा किया गया है। जनता द्वारा निर्वाचित प्रतिनिधियों की सभा द्वारा संविधान का निर्माण किया गया है।

    2. प्रभुत्व-संपत्र- भारतीय स्वतंत्रता अधिनियम 1947 के पास होने के बाद भारत ब्रिटिश साम्राज्य का आश्रित नहीं रहा। वह पूर्ण रूप से प्रभुता संपन्न राज्य हो गया कानूनी दृष्टि से न तो उसके ऊपर किसी आंतरिक शक्ति न किसी बाहरी शक्ति का प्रतिबंध है।

  • राष्ट्र मंडल की सदस्यता- यह पूर्ण स्वतंत्र राष्ट्रों का स्वतंत्र और स्वैच्छिक संगठन है उसमें शामिल सभी सदस्य राष्ट्र पूर्णतः स्वतंत्र और प्रभुत्व संपन्न है ।
  • भारत ने यह सदस्यता अपनी इच्छा से सन् 1949 में स्वीकार की, वह जब चाहें त्याग सकता है।

    3. समाजवाद – संविधान के 42वाँ संशोधन अधिनियम 1976 के द्वारा जोड़ा गया है। समाजवाद का आशय है कि आय प्रतिष्ठा और जीवनयापन के स्तर में विषमता का अन्त हो जाए। इसका मूलतत्व कमजोर वर्ग और कर्मकारों के जीवन स्तर को ऊँचा करना तथा जन्म से मृत्यु तक सामाजिक सुरक्षा की गारंटी देना। भारतीय समाजवाद लोकतांत्रिक समाजवाद है जो मिश्रित अर्थव्यवस्था का प्रयोग करता है।

    4. लोकतन्त्रात्मक- मुख्यतः दो प्रकार की लोकतांत्रिक शासन-प्रणालियाँ प्रयोग में हैं- (i) प्रत्यक्ष प्रणाली (ii) अप्रत्यक्ष प्रणाली।

  • भारत में अप्रत्यक्ष प्रतिनिधि संसदीय प्रणाली को अपनाया गया है। अप्रत्यक्ष लोकतन्त्र में लोगों द्वारा चुने गए प्रतिनिधि सर्वोच्च शक्ति का प्रयोग करते हुए कानून का निर्माण कर शासन चलाते है।
  • लोकतन्त्र को अल्पसंख्यको की सहमति से बहुमतों का शासन भी कहते हैं। लोकतंत्र के सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक पहलू हैं।
  • लोकतंत्र का तात्पर्य है “जनता का, जनता के द्वारा जनता के लिए स्थापित सरकार है।
  • लोकतंत्र में भारतीय संविधान निर्माताओं ने 18 वर्ष तथा उससे ऊपर के सभी वयस्कों पुरूषों तथा स्त्रियों को अनुच्छेद 326 के तहत मतदान का अधिकार देकर पूर्ण प्रतिनिधित्व प्रदान किया है। वयस्क मताधिकार, सामयिक चुनाव, कानून की सर्वोच्चता, न्यायपालिका की स्वतंत्रता व भेदभाव का अभाव भारतीय राज्यव्यवस्था के लोकतन्त्र के स्वरूप है।

5. गणतन्त्र लोकतात्रिक राज्यव्यवस्था के दो भाग हैं-

    (i) राजशाही- इस व्यवस्था में राज्य प्रमुख वंशानुगत होता है।

    (ii) गणतंत्र- राज्य का अध्यक्ष लोगों द्वारा एक निश्चित अवधि के लिए चुना जाता है। वह जनता का अप्रत्यक्ष चुना हुआ प्रतिनिधि होता हैं।

    गणतन्त्र का अभिप्राय है कि वह राज्य जो राजा या इसी तरह के एक शासन द्वारा शासित नहीं होती बल्कि जिसमें उच्चतम शक्ति लोगों में और उनके निर्वाचित प्रतिनिधियों में निहित हैं।

    6. पथ निरपेक्ष 42वें संविधान संशोधन द्वारा 1976 में इस शब्द को जोड़कर सर्व-धर्म समभाव की स्थिति को और अधिक स्पष्ट किया गया है। संविधान के अनुच्छेद 25 से 28 में, उद्देशिका में, और भाग 4(क) में पथ निरपेक्ष शब्द जोड़ा गया है।

  • पंथ निरपेक्ष का तात्पर्य है कि राज्य किसी विशेष धर्म को राजधर्म के रूप में मान्यता नहीं प्रदान करता हैं वरन् सभी के साथ समान व्यवहार करता है।

    7. अखण्डता इस शब्द को 42वें संविधान संशोधन द्वारा जोड़ा गया । है। अनुच्छेद 19 के आधार पर राज्य को नागरिकों की स्वतंत्रताओं पर देश की अखण्डता के आधार पर निर्वन्धन लगाने की शक्ति प्राप्त है।

    8. स्वतंत्रता संविधान का मुख्य उद्देश्य भारतीय जनता को सामाजिक राजनीतिक, आर्थिक आधार पर न्याय पद, एवं अवसर की समानता, मत विचार और धर्म की स्वतंत्रता तथा व्यक्ति की गरिमा एवं राष्ट्र की अखण्डता के लिए अधिकार दिलाता है।

    9. न्याय

    सामाजिक न्याय- धर्म, मूलवंश, जाति, लिंग, जन्म स्थान के आधार भेदभाव नहीं किया जायेगा।

    आर्थिक न्याय- वितरणात्मक न्याय (राज्य के सभी संसाधनों पर सभी का अधिकार) अनुच्छेद 391

    राजनैतिक न्याय- सभी व्यक्तियों के पास राजनैतिक अधिकार उपलब्ध जैसे- चुनाव लड़ना, वोट देना, बोलना इत्यादि। जैसे अनुच्छेद 19 व अनुच्छेद 326 1917 के रूसी क्रांति के द्वारा आया है।

  • हमारी प्रस्तावना में समानता, स्वतंत्रता और बन्धुता के आदर्शों को फ्रांस की क्रांति 1789 से 1799 ई से लिया गया है। स्वतंत्रता का तात्पर्य है संविधान द्वारा व्यक्ति के विकास के लिए अवसर प्रदान करना तथा विचार, विश्वास, धर्म और उपासना की स्वतंत्रता इस प्रकार हो कि राज्य, लोक हित आदि की सुरक्षा खतरे में न पड़े।
  • समानता से तात्पर्य है कि हर व्यक्ति को उसकी क्षमता के आधार पर बिना किसी भेदभाव के समान अवसर राजनीतिक, नागरिक तथा आर्थिक समानता प्रदान करना।
  • प्रस्तावना में ‘न्याय’ को ‘स्वतंत्रता’ और ‘समता’ से भी ऊपर रखा गया है। भारतीय संविधान में न्याय का आदर्श है। “सर्वेजनाः सुखिनः, सर्वे संतु निरामया” इस आदर्श का उल्लेख संविधान के चौथे भाग और अनुच्छेद 38 में किया गया हैं।
  • बेरूबारी संघ 1960 (यूनियन) के मामले में उच्चतम न्यायलय ने अपने आदेश में कहा कि उद्देशिका संविधान का अंग नहीं हैं। उद्देशिका का महत्त्व केवल तब होता है जब संविधान की भाषा अस्पष्ट हो।
  • किन्तु 1973 में केशवानंद भारती मामले में उच्चतम न्यायालय ने बेरूबारी के मामले में दिये गये निर्णय को उलट दिया और अपने आदेश में कहा कि प्रस्तावना संविधान का एक भाग हैं।
  • गोलकनाथ बनाम स्टेट ऑफ पंजाब सन् 1967 के मामले में न्यायाधिपति ने कहा “उद्देशिका किसी अधिनियम के मुख्य आदर्शों एवं आकांक्षाओं का उल्लेख करती हैं”।
  • उद्देशिका में संशोधन- 42वें संविधान संशोधन द्वारा स्पष्ट कर दिया गया कि संसद को उद्देशिका में संशोधन करने की शक्ति है। किन्तु 1973 में केशवानन्द भारती बनाम केरल राज्य के मामले में दिये गये निर्णय कि “उद्देशिका के उस भाग को जो मूल ढ़ाचे से सम्बन्धित हैं, संशोधन नहीं किया जा सकता है” को प्रभावित करती है।
  • 42वें संविधान संशोधन को इस आधार पर न्यायालय में चुनौती दी जा सकती है कि वह उद्देशिका के मूल ढांचे को नष्ट करता है।
  • भारतीय संविधान के प्रस्तावना को उसकी आत्मा की व्याख्या दी गई है।
  • भारत को मुख्य रूप से एक गणराज्य माना जाता क्योंकि यहाँ राज्याध्यक्ष का चुनाव होता है।
  • 26 नवम्बर 1949 को अंगीकृत भारतीय संविधान की प्रस्तावना में समाजवादी, पंथ निरपेक्ष, और अखण्डता शब्द नहीं थे।
  • भारत के संविधान को प्रस्तावना में स्पष्ट रूप से घोषणा की गई कि भारत एक धर्म निरपेक्ष राज्य है।
  • भारतीय संघ और अमेरिको संघ दोनों में एक विशेषता यह हैं कि संविधान की व्याख्या के लिए संघीय उच्चतम न्यायालय को अधिकार प्राप्त है।
  • संघात्मक शासन व्यवस्था को सर्वप्रथम कनाडा ने अपनाया था।
  • संसदीय शासन प्रणाली सर्वप्रथम ब्रिटेन ने अपनाया था। विधि के समक्ष समता का सिद्धान्त इंग्लैण्ड के संविधान से लिया गया है।

शासन व्यवस्था का स्वरूप

    1. संपूर्ण प्रभुत्व संपन्न                      2. समाजवादी

    3. पंथ निरेक्ष                                   4. लोकतंत्रात्मक

    5. गणराज्य

पंथनिरपेक्ष (Secularism)- किसी विशेष धर्म को राजधर्म को मान्यता नहीं।

    नोट- वर्तमान परिप्रेक्ष्य में पंथनिरपेक्ष शब्द की उपयोगिता अधिक प्रासंगिक हो गई है यह आय दिन सुनने में आ रहा है कि Secularism खतरे में हैं। आखिर यह है क्या? इसे संक्षिप्त में समझते हैं।

संपद्राय- एक जैसी विचारधारा, मूल्यों व मान्यताओं को मानने वाले लोग जैसे- हिन्दू. मुस्लिम, सिख, ईसाई, जैन आदि भारतीय पंथनिरपेक्षता पाश्चात्य पंथनिरपेक्षता से बिल्कुल अलग हैं जहां पाश्चात्य विचारधारा राजनीति व धर्म को बिल्कुल अलग करती है (मैकियावेली) वहीं भारतीय पंथनिरपेक्षता ‘सर्व धर्म संभाव’ की भावना से प्रेरित है अर्थात सभी धर्मों को एक साथ लेकर चलने का प्रयास करती है। भाग-3 (अनुच्छेद 25 से 28)

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